शैलेष कुमार सोनकर
मेराज़ मुस्तफा नाम एक मगर पहचान का जरिया कई। कुछ वर्ष पूर्व तक सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा सबसे कम उम्र के ग्राम प्रधान की वजह से पहचाने जाते थे और ग्राम प्रधान के तौर पर प्रतिदिन सभी समाचार पत्रों में ग्रामीण विकास व समाजहित में किए गए कार्यों के लिए जाने जाते थे और इस रूप में पहचान भी आसानी से नही मिली बल्कि सभी के सुख दुख में भागीदार बनने के बाद ही वह सब प्राप्त हुआ। मई 2016 में भीषण आग की चपेट में आने के बाद रेहरा उर्फ भैसाही का यह युवा ग्राम प्रधान मेराज़ मुस्तफा पम्पिंग सेट में लगे डिलीवरी पाईप को स्वयं के कंधे पर रखकर आगे बुझाते हुए देख तत्कालीन थानाध्यक्ष मिश्रौलिया रवि राय जो स्वयं वहां आग बुझाने के लिए मेहनत कर रहे थे उन्होंने जब मेराज़ मुस्तफा को पम्पिंग सेट पाईप लेकर आग की लपटों की परवाह किए बगैर इस नौजवान ग्राम प्रधान को देखा तो तत्कालीन थानाध्यक्ष रवि राय ने वहां उपस्थित लोगों से बस यही कहा कि आपने जो वोट देकर मेराज़ मुस्तफा को ग्राम प्रधान चुना है आज मेराज़ मुस्तफा ने उस हक की अदायगी कर दी।
सिद्धार्थनगर के इस युवा ग्राम प्रधान की लोकप्रियता जब समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक पहुचने लगी तो सभी के दिलो दिमाग में इस युवा ने अपनी जगह बना ली। युवा ग्राम प्रधान मेराज़ मुस्तफा ने जब कलम पकड़ी तो उस कलम से निकलने वाली रचनाएं व लेख विभिन्न समाचार पत्रों द्वारा सभी तक पहुंचने लगे और आज स्थिति यह है कि प्रदेश ही नही वरन देश के विभिन्न कोनों से वरिष्ठ साहित्यकारों व बुद्धजीवियों के दिल को जीत लिया। मेराज़ मुस्तफा द्वारा लिखित रचनाओं व लेखों को पढ़कर कोई भी यह नही कह सकता कि यह इतनी कम उम्र के एक युवा के कलमों से निकले हैं लेकिन मेराज़ मुस्तफा ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि कलम को सही तरीके से प्रयोग किया जाए तो वह भी तलवार बन जाती है। शारीरिक समस्याओं से जूझने व अपने बेहद करीबी मित्र के आकस्मिक निधन के बाद भी मेराज़ मुस्तफा ने हौंसला बनाए रखा और अपनी कलम को थमने नही दिया जिसके परिणामस्वरूप आज मेराज़ मुस्तफा देश के वरिष्ठ साहित्यकारों व बुद्धजीवी वर्ग के आशीर्वाद के भागीदार बन रहे। जिन वरिष्ठ साहित्यकारों व पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्तियों ने मेराज़ मुस्तफा को कभी देखा नही वह भी उनकी रचनाओं को पढ़कर सोशल मीडिया के माध्यम से बात करते हुए आशीर्वाद व शुभकामनाएं दे रहे। युवा ग्राम प्रधान से युवा रचनाकार तक का सफर तय करने वाले मेराज़ मुस्तफा को हजारों की संख्या में बधाई व शुभकामना सन्देश प्रतिदिन उनके व्हाट्सएप व मोबाईल कॉल पर मिल रहे।
माँ सरस्वती की कृपा युवा रचनाकार पर सदैव यूं ही बनी रहे ईश्वर से यही कामना है। पेश है मेराज़ मुस्तफा की एक रचना की चन्द पंक्तियां -
दर्द जो तुमने दिया सह तो गए हैं मुस्कुराकर हम,
मगर यह मत समझना कि दर्द से डर गए हम।
वक़्त आने पर दिखा देंगे सारी दुनिया को यह,
मुसलमान हैं वतन की खातिर जान भी लुटा देंगे हम।
बेबसी में रुक गया हूं पांव में काँटों की चुभन से,
मतलब यह नही की रुककर तुझसे पिछड़ गए हम।
'मेराज़' की मौत की दुआ मांगने की खातिर नमाज पढ़ने लगे रकीब,
अल्लाह तेरा शुक्र है कि इसी बहाने जरिए इसाल ए सवाब बन गए हम।
मेराज़ मुस्तफा नाम एक मगर पहचान का जरिया कई। कुछ वर्ष पूर्व तक सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा सबसे कम उम्र के ग्राम प्रधान की वजह से पहचाने जाते थे और ग्राम प्रधान के तौर पर प्रतिदिन सभी समाचार पत्रों में ग्रामीण विकास व समाजहित में किए गए कार्यों के लिए जाने जाते थे और इस रूप में पहचान भी आसानी से नही मिली बल्कि सभी के सुख दुख में भागीदार बनने के बाद ही वह सब प्राप्त हुआ। मई 2016 में भीषण आग की चपेट में आने के बाद रेहरा उर्फ भैसाही का यह युवा ग्राम प्रधान मेराज़ मुस्तफा पम्पिंग सेट में लगे डिलीवरी पाईप को स्वयं के कंधे पर रखकर आगे बुझाते हुए देख तत्कालीन थानाध्यक्ष मिश्रौलिया रवि राय जो स्वयं वहां आग बुझाने के लिए मेहनत कर रहे थे उन्होंने जब मेराज़ मुस्तफा को पम्पिंग सेट पाईप लेकर आग की लपटों की परवाह किए बगैर इस नौजवान ग्राम प्रधान को देखा तो तत्कालीन थानाध्यक्ष रवि राय ने वहां उपस्थित लोगों से बस यही कहा कि आपने जो वोट देकर मेराज़ मुस्तफा को ग्राम प्रधान चुना है आज मेराज़ मुस्तफा ने उस हक की अदायगी कर दी।
सिद्धार्थनगर के इस युवा ग्राम प्रधान की लोकप्रियता जब समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक पहुचने लगी तो सभी के दिलो दिमाग में इस युवा ने अपनी जगह बना ली। युवा ग्राम प्रधान मेराज़ मुस्तफा ने जब कलम पकड़ी तो उस कलम से निकलने वाली रचनाएं व लेख विभिन्न समाचार पत्रों द्वारा सभी तक पहुंचने लगे और आज स्थिति यह है कि प्रदेश ही नही वरन देश के विभिन्न कोनों से वरिष्ठ साहित्यकारों व बुद्धजीवियों के दिल को जीत लिया। मेराज़ मुस्तफा द्वारा लिखित रचनाओं व लेखों को पढ़कर कोई भी यह नही कह सकता कि यह इतनी कम उम्र के एक युवा के कलमों से निकले हैं लेकिन मेराज़ मुस्तफा ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि कलम को सही तरीके से प्रयोग किया जाए तो वह भी तलवार बन जाती है। शारीरिक समस्याओं से जूझने व अपने बेहद करीबी मित्र के आकस्मिक निधन के बाद भी मेराज़ मुस्तफा ने हौंसला बनाए रखा और अपनी कलम को थमने नही दिया जिसके परिणामस्वरूप आज मेराज़ मुस्तफा देश के वरिष्ठ साहित्यकारों व बुद्धजीवी वर्ग के आशीर्वाद के भागीदार बन रहे। जिन वरिष्ठ साहित्यकारों व पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्तियों ने मेराज़ मुस्तफा को कभी देखा नही वह भी उनकी रचनाओं को पढ़कर सोशल मीडिया के माध्यम से बात करते हुए आशीर्वाद व शुभकामनाएं दे रहे। युवा ग्राम प्रधान से युवा रचनाकार तक का सफर तय करने वाले मेराज़ मुस्तफा को हजारों की संख्या में बधाई व शुभकामना सन्देश प्रतिदिन उनके व्हाट्सएप व मोबाईल कॉल पर मिल रहे।
माँ सरस्वती की कृपा युवा रचनाकार पर सदैव यूं ही बनी रहे ईश्वर से यही कामना है। पेश है मेराज़ मुस्तफा की एक रचना की चन्द पंक्तियां -
दर्द जो तुमने दिया सह तो गए हैं मुस्कुराकर हम,
मगर यह मत समझना कि दर्द से डर गए हम।
वक़्त आने पर दिखा देंगे सारी दुनिया को यह,
मुसलमान हैं वतन की खातिर जान भी लुटा देंगे हम।
बेबसी में रुक गया हूं पांव में काँटों की चुभन से,
मतलब यह नही की रुककर तुझसे पिछड़ गए हम।
'मेराज़' की मौत की दुआ मांगने की खातिर नमाज पढ़ने लगे रकीब,
अल्लाह तेरा शुक्र है कि इसी बहाने जरिए इसाल ए सवाब बन गए हम।


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