शैलेष कुमार सोनकर
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उपरोक्त पंक्तियां वर्तमान में मानवता पर सटीक रूप से बैठती हैं एक कहावत है मुंह में राम बगल में छूरी ।
सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा की यह पंक्तियां एक तमाचा है ऐसे लोगों के लिए जो ऊपर से हमदर्द बनकर अंदर से आस्तीन के सांप की तरह डस रहे।बेहद कम वक्त में सम्पूर्ण देश में अपने लेखों व रचनाओं के जरिए वरिष्ठ साहित्यकारों से लेकर हिन्दी - उर्दू अदब के कलमकारों के साथ प्रदेश व देश के उच्चकोटि के वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा सराहना प्राप्त करने वाले सिद्धार्थनगर के युवा ग्राम प्रधान व प्रवक्ता प्रधान संघ के अतिरिक्त पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने वाले युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा ने मात्र एक पंक्ति में जो हकीकत बयान कर दी उसको भाषणों के तौर पर सबके समक्ष रखा जाता तो कितना वक्त और कितनी पंक्तियों का सहारा लेना पड़ता आप स्वयं अंदाजा लगा लीजिए। मेराज़ मुस्तफा जिनको देखकर हर कोई यही कहेगा कि एक कम उम्र के नौजवान लड़के के द्वारा इतने कीमती पंक्तियां कतई नही लिखी जा सकती लेकिन हकीकत तो यही है कि युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा द्वारा अब तक लिखे गए ढाई सौ से अधिक गजल , नज़्म , कविताओं के अतिरिक्त सैकड़ों लेख जो विभिन्न विषयों पर आधारित हैं उसको पढ़ने के पश्चात आपकी सोच गलत साबित हो जाएगी। इटवा तहसील क्षेत्र के विकास खण्ड खुनियांव के एक छोटे से गांव रेहरा उर्फ भैसाही निवासी युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा जो ग्राम प्रधान होने के साथ ही संगठन में प्रवक्ता के तौर पर भी कार्य कर रहे वों अपने उत्कृष्ट लेखों द्वारा अपनी छाप सम्पूर्ण भारत में छोड़ रहे। मेराज़ मुस्तफा के द्वारा लिखित लेख विभिन्न समाचार पत्रों व न्यूज वेब पोर्टलों पर समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं एवं उन्हीं लेखों ने उन्हें युवा ग्राम प्रधान की छवि से बदलकर युवा रचनाकार के रूप में ज्यादा जाने पहचाने जाते हैं । विगत पांच माह में दो सौ से अधिक बेहतरीन गजल , नज़्म व कविता लिख चुके मेराज़ मुस्तफा की हर एक रचना को पढ़ने के पश्चात यही लगेगा कि हम किसी ऐसे शख़्स की रचनाओं को पढ़ रहें जो वर्षों से साहित्यिक जगत का हिस्सा हों लेकिन हकीकत यही है कि इस युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा के कलमों से निकलने वाला हर लफ्ज जादुई साबित हो रहा एवं हर एक रचना एक मुकम्मल किताब बन जाती है। पेश हैं युवा कलमकार मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह "अधूरे ख्वाब भरे किरदार" की कुछ पंक्तियां-
दौड़ रहा उबलता लहू जो रगों में मुकम्मल खालिस ईमान के साथ,
चंद लोगों की वजह से लफ्ज गद्दार मत जोड़ो मुसलमान के साथ।
हम खाकर कसम वतन की कहते रहेंगे इस बात को उम्र भर,
अल्लाह ने वतनपरस्ती भी दिया है इस्लाम वालों को पाक कुरआन के साथ।
लाजिम है दिल में मोहब्बत अल्लाह और रसूल - ए - पाक के लिए,
वरना जालिम फिरऔन भी दावा करता था ख़ुदाई का उस दौर के इंसान के साथ।
किसी जालिम हुक्मरान के आगे खड़ा होना कांसा लेकर नामुमकिन है,
सिर कटा लेंगे मंजूर है यह बोल रहा 'मेराज़' ऐलान के साथ ।।
उपरोक्त रचना में मेराज़ मुस्तफा ने हकीकत बयान करते हुए तथाकथित देशभक्तों को आईना दिखा दिया जो बार-बार धर्म व मजहब के नाम पर समाज को बांटने का कार्य करते आ रहे।
कोई जरूरत नही परों की ऊंची परवाज के लिए,
हौसलाअफजाई करते रहो काफी है इक जांबाज के लिए।
मीठे हो या कड़वे नही फर्क पड़ता कुछ उससे,
जो तरसा हो मुद्दतों सुनने को तेरी आवाज के लिए।
बात खुद ही छेड़ दी है जब तो चल बस इतना ही बता दे,
जहर भर रखा है जब दिल में तो क्यों जाता है नमाज के लिए।
सालों गुजर गए पर अब भी वहीं ठहरा हुआ है 'मेराज़',
जहां कभी तू ठहरा करती थी मेरे इक जवाब के लिए।
इन जैसी तमाम पंक्तियों को अपने कलम से निकालकर हमारे समक्ष रखने वाले युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा की कलम में ईश्वर सदैव अपनी कृपादृष्टि बनाएं रखे ताकि ऐसी बेहतरीन रचनाएं व मेराज़ मुस्तफा के लेख हमें मिलते रहें यही कामना है।
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उपरोक्त पंक्तियां वर्तमान में मानवता पर सटीक रूप से बैठती हैं एक कहावत है मुंह में राम बगल में छूरी ।
सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा की यह पंक्तियां एक तमाचा है ऐसे लोगों के लिए जो ऊपर से हमदर्द बनकर अंदर से आस्तीन के सांप की तरह डस रहे।बेहद कम वक्त में सम्पूर्ण देश में अपने लेखों व रचनाओं के जरिए वरिष्ठ साहित्यकारों से लेकर हिन्दी - उर्दू अदब के कलमकारों के साथ प्रदेश व देश के उच्चकोटि के वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा सराहना प्राप्त करने वाले सिद्धार्थनगर के युवा ग्राम प्रधान व प्रवक्ता प्रधान संघ के अतिरिक्त पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने वाले युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा ने मात्र एक पंक्ति में जो हकीकत बयान कर दी उसको भाषणों के तौर पर सबके समक्ष रखा जाता तो कितना वक्त और कितनी पंक्तियों का सहारा लेना पड़ता आप स्वयं अंदाजा लगा लीजिए। मेराज़ मुस्तफा जिनको देखकर हर कोई यही कहेगा कि एक कम उम्र के नौजवान लड़के के द्वारा इतने कीमती पंक्तियां कतई नही लिखी जा सकती लेकिन हकीकत तो यही है कि युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा द्वारा अब तक लिखे गए ढाई सौ से अधिक गजल , नज़्म , कविताओं के अतिरिक्त सैकड़ों लेख जो विभिन्न विषयों पर आधारित हैं उसको पढ़ने के पश्चात आपकी सोच गलत साबित हो जाएगी। इटवा तहसील क्षेत्र के विकास खण्ड खुनियांव के एक छोटे से गांव रेहरा उर्फ भैसाही निवासी युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा जो ग्राम प्रधान होने के साथ ही संगठन में प्रवक्ता के तौर पर भी कार्य कर रहे वों अपने उत्कृष्ट लेखों द्वारा अपनी छाप सम्पूर्ण भारत में छोड़ रहे। मेराज़ मुस्तफा के द्वारा लिखित लेख विभिन्न समाचार पत्रों व न्यूज वेब पोर्टलों पर समय-समय पर प्रकाशित होती रहती हैं एवं उन्हीं लेखों ने उन्हें युवा ग्राम प्रधान की छवि से बदलकर युवा रचनाकार के रूप में ज्यादा जाने पहचाने जाते हैं । विगत पांच माह में दो सौ से अधिक बेहतरीन गजल , नज़्म व कविता लिख चुके मेराज़ मुस्तफा की हर एक रचना को पढ़ने के पश्चात यही लगेगा कि हम किसी ऐसे शख़्स की रचनाओं को पढ़ रहें जो वर्षों से साहित्यिक जगत का हिस्सा हों लेकिन हकीकत यही है कि इस युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा के कलमों से निकलने वाला हर लफ्ज जादुई साबित हो रहा एवं हर एक रचना एक मुकम्मल किताब बन जाती है। पेश हैं युवा कलमकार मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह "अधूरे ख्वाब भरे किरदार" की कुछ पंक्तियां-
दौड़ रहा उबलता लहू जो रगों में मुकम्मल खालिस ईमान के साथ,
चंद लोगों की वजह से लफ्ज गद्दार मत जोड़ो मुसलमान के साथ।
हम खाकर कसम वतन की कहते रहेंगे इस बात को उम्र भर,
अल्लाह ने वतनपरस्ती भी दिया है इस्लाम वालों को पाक कुरआन के साथ।
लाजिम है दिल में मोहब्बत अल्लाह और रसूल - ए - पाक के लिए,
वरना जालिम फिरऔन भी दावा करता था ख़ुदाई का उस दौर के इंसान के साथ।
किसी जालिम हुक्मरान के आगे खड़ा होना कांसा लेकर नामुमकिन है,
सिर कटा लेंगे मंजूर है यह बोल रहा 'मेराज़' ऐलान के साथ ।।
उपरोक्त रचना में मेराज़ मुस्तफा ने हकीकत बयान करते हुए तथाकथित देशभक्तों को आईना दिखा दिया जो बार-बार धर्म व मजहब के नाम पर समाज को बांटने का कार्य करते आ रहे।
कोई जरूरत नही परों की ऊंची परवाज के लिए,
हौसलाअफजाई करते रहो काफी है इक जांबाज के लिए।
मीठे हो या कड़वे नही फर्क पड़ता कुछ उससे,
जो तरसा हो मुद्दतों सुनने को तेरी आवाज के लिए।
बात खुद ही छेड़ दी है जब तो चल बस इतना ही बता दे,
जहर भर रखा है जब दिल में तो क्यों जाता है नमाज के लिए।
सालों गुजर गए पर अब भी वहीं ठहरा हुआ है 'मेराज़',
जहां कभी तू ठहरा करती थी मेरे इक जवाब के लिए।
इन जैसी तमाम पंक्तियों को अपने कलम से निकालकर हमारे समक्ष रखने वाले युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा की कलम में ईश्वर सदैव अपनी कृपादृष्टि बनाएं रखे ताकि ऐसी बेहतरीन रचनाएं व मेराज़ मुस्तफा के लेख हमें मिलते रहें यही कामना है।


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