सत्येन्द्र उपाध्याय/ मेराज़ मुस्तफा की विशेष रिपोर्ट
सिद्धार्थनगर: गांव,कस्बों पर चल रही चाय की दुकानों पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ समाचार पत्र हाथ में लेकर ग्रामीण स्तर से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर चर्चा करते हुए लोगों की नजर जैसे ही किसी पत्रकार पर पड़ती है तो सभी के मुंह यूं बन जाते हैं जैसे चाय में शक्कर की जगह लाल मिर्च डाल दिया गया हो।जी हां यह बात करते हुए थोड़ा अजीब जरूर लगता है परन्तु कटु सत्य यही है कि पत्रकारिता करने वालों की छवि आम जनमानस से लेकर उच्चस्तरीय अधिकारी व जनप्रतिनिधियों के बीच कुछ ऐसी ही बनी है जिसके लिए कोई अन्य नही बल्कि हम जैसे लोग जो पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े हैं स्वयं जिम्मेदार हैं।अब आगे बात और कड़वी लगेगी कि क्या वाकई पत्रकारिता करने वाले ही इस परिस्थिति के जिम्मेदार हैं तो मेरा जवाब होगा हां हम स्वयं इसके जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने खुद ही अधिकारी वर्ग से लेकर जनप्रतिनिधियों व आम जनमानस के बीच बैठने के बाद अपने क्षेत्र में पत्रकारिता करने वालों के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करके उस पत्रकार बन्धु की गरिमा को सबकी नजर में गिराने के लिए किया जिसका असर बाद में कुछ यूं होता है कि उस पत्रकार बन्धु को नीचा दिखाने की खातिर जो शब्द मैंने सबके समक्ष किया आज वही शब्द मेरे लिए ही उन्ही अधिकारीगण,जनप्रतिनिधि व आम जनमानस द्वारा किया जाता है अलग बात है कि मैं स्वयं के लिए प्रयुक्त शब्द को जानबूझकर अनदेखा करने की कोशिश करते हैं कि नही मैं तो इतने वर्षों से पत्रकारिता कर रहा मैं इस समाचार पत्र से जुड़ा हूं तो लोग मेरे लिए ऐसे शब्द क्यों प्रयोग करेंगे जबकि सामने वाला पत्रकार जिस भी समाचार पत्र या चैनल के लिए कार्य करता है उसका कोई नाम तक नही जानता बस इसी अवधारणा को ढोते हुए हम चले जा रहे।मैं ही सबसे बड़ा पत्रकार हूं फला पत्रकार तो पचास रूपये में बिकने वाला पत्रकार है कहकर हम उस पत्रकार बन्धु की नही बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की गरिमा गिरा रहे।छोटा पत्रकार बड़ा पत्रकार होता क्या है मुझे खुद नही पता लेकिन मैं इन शब्दों का प्रयोग समाज में लोगों के बीच बैठकर दूसरे पत्रकार बन्धु के लिए प्रतिदिन जरूर करता हूं ताकि मैं समाज में सबके सामने तो यह साबित करता रहूं कि पत्रकारिता की शुरुआत तो मेराज़ मुस्तफा से ही होती है बाकी सब तो छोटे मोटे पत्रकार हैं जिनकी मेराज़ मुस्तफा के सामने कोई अस्तित्व नही और यही सोच मेराज़ मुस्तफा की छवि के साथ-साथ सम्पूर्ण पत्रकारिता की छवि गिराने का कार्य करता है।जिन अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के समक्ष मैं दूसरे पत्रकार बन्धु की बुराई करता हूं उससे वह अधिकारी भी समझ जाते हैं और जनप्रतिनिधि भी कि छोटा पत्रकार वह नही है जिसके सन्दर्भ में मेराज़ मुस्तफा बोल रहा बल्कि छोटा और चाटूकारिता से भरा हुआ पत्रकार मेराज़ मुस्तफा स्वयं ही है वर्ना अपने कार्य को करने की बजाय यह मेरे साथ बैठकर मेरी चापलूसी नही करता।मेरे द्वारा लिखित यह कड़वी बात मैंने किसी व्यक्ति विशेष या समाचार पत्र के संदर्भ में कतई नही है बल्कि यह वर्तमान समय में पत्रकारिता की हालत पर आधारित है।
सिद्धार्थनगर: गांव,कस्बों पर चल रही चाय की दुकानों पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ समाचार पत्र हाथ में लेकर ग्रामीण स्तर से लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर चर्चा करते हुए लोगों की नजर जैसे ही किसी पत्रकार पर पड़ती है तो सभी के मुंह यूं बन जाते हैं जैसे चाय में शक्कर की जगह लाल मिर्च डाल दिया गया हो।जी हां यह बात करते हुए थोड़ा अजीब जरूर लगता है परन्तु कटु सत्य यही है कि पत्रकारिता करने वालों की छवि आम जनमानस से लेकर उच्चस्तरीय अधिकारी व जनप्रतिनिधियों के बीच कुछ ऐसी ही बनी है जिसके लिए कोई अन्य नही बल्कि हम जैसे लोग जो पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े हैं स्वयं जिम्मेदार हैं।अब आगे बात और कड़वी लगेगी कि क्या वाकई पत्रकारिता करने वाले ही इस परिस्थिति के जिम्मेदार हैं तो मेरा जवाब होगा हां हम स्वयं इसके जिम्मेदार हैं क्योंकि हमने खुद ही अधिकारी वर्ग से लेकर जनप्रतिनिधियों व आम जनमानस के बीच बैठने के बाद अपने क्षेत्र में पत्रकारिता करने वालों के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करके उस पत्रकार बन्धु की गरिमा को सबकी नजर में गिराने के लिए किया जिसका असर बाद में कुछ यूं होता है कि उस पत्रकार बन्धु को नीचा दिखाने की खातिर जो शब्द मैंने सबके समक्ष किया आज वही शब्द मेरे लिए ही उन्ही अधिकारीगण,जनप्रतिनिधि व आम जनमानस द्वारा किया जाता है अलग बात है कि मैं स्वयं के लिए प्रयुक्त शब्द को जानबूझकर अनदेखा करने की कोशिश करते हैं कि नही मैं तो इतने वर्षों से पत्रकारिता कर रहा मैं इस समाचार पत्र से जुड़ा हूं तो लोग मेरे लिए ऐसे शब्द क्यों प्रयोग करेंगे जबकि सामने वाला पत्रकार जिस भी समाचार पत्र या चैनल के लिए कार्य करता है उसका कोई नाम तक नही जानता बस इसी अवधारणा को ढोते हुए हम चले जा रहे।मैं ही सबसे बड़ा पत्रकार हूं फला पत्रकार तो पचास रूपये में बिकने वाला पत्रकार है कहकर हम उस पत्रकार बन्धु की नही बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की गरिमा गिरा रहे।छोटा पत्रकार बड़ा पत्रकार होता क्या है मुझे खुद नही पता लेकिन मैं इन शब्दों का प्रयोग समाज में लोगों के बीच बैठकर दूसरे पत्रकार बन्धु के लिए प्रतिदिन जरूर करता हूं ताकि मैं समाज में सबके सामने तो यह साबित करता रहूं कि पत्रकारिता की शुरुआत तो मेराज़ मुस्तफा से ही होती है बाकी सब तो छोटे मोटे पत्रकार हैं जिनकी मेराज़ मुस्तफा के सामने कोई अस्तित्व नही और यही सोच मेराज़ मुस्तफा की छवि के साथ-साथ सम्पूर्ण पत्रकारिता की छवि गिराने का कार्य करता है।जिन अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के समक्ष मैं दूसरे पत्रकार बन्धु की बुराई करता हूं उससे वह अधिकारी भी समझ जाते हैं और जनप्रतिनिधि भी कि छोटा पत्रकार वह नही है जिसके सन्दर्भ में मेराज़ मुस्तफा बोल रहा बल्कि छोटा और चाटूकारिता से भरा हुआ पत्रकार मेराज़ मुस्तफा स्वयं ही है वर्ना अपने कार्य को करने की बजाय यह मेरे साथ बैठकर मेरी चापलूसी नही करता।मेरे द्वारा लिखित यह कड़वी बात मैंने किसी व्यक्ति विशेष या समाचार पत्र के संदर्भ में कतई नही है बल्कि यह वर्तमान समय में पत्रकारिता की हालत पर आधारित है।


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