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Saturday, December 15, 2018

बड़ा सवाल : कब तक यूं दहेज की बलि चढ़ती रहेंगी बेटियां ?

इटवा-सिद्धार्थनगर:- समाज के लिए कलंक बन चुका दहेज रूपी हथियार और कितनी बेटियों की जिंदगी निगलेगा?शायद इस सवाल का जवाब सभी के पास है भी और नही भी है तभी तो आए दिन देश में रोजाना न जाने कितनी बेटियां दहेज रूपी सूली पर टांग दी जाती हैं और टांगने वाले भी वह लोग जो बाप के समान ससुर व माँ के समान सास जिसमें साथ देते हैं भाई समान देवर बड़ी बहन समान जेठानी व छोटी बहन समान ननद के अतिरिक्त एक ऐसा रिश्ता जिसकी खातिर एक लड़की अपने माँ-बाप का आंगन छोड़कर हमेशा के लिए उस इंसान के पास आ जाती है जिसे शास्त्रों में परमेश्वर कहा गया है यानि पति लेकिन जब यही लोग चन्द कागज के नोटों की खातिर मानवहत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए कदम उठाते हैं तो यह क्यों नही सोचते कि वह सिर्फ एक जिंदगी नही वरन एक माता-पिता के साथ-साथ एक भाई से उसकी बहन एक बहन से उसकी सबसे प्यारी सहेली और सबसे बेशकीमती जिंदगी एक मासूम सन्तान से उसकी माँ को छीनने जा रहे।
एक माता-पिता के लिए उसकी वह सन्तान जिसको वर्षों तक अपनी कलेजे के टुकड़े समान पाल पोषकर किस तरह छाती पर पत्थर रखकर उस कलेजे के टुकड़े को दूसरे के हवाले कर देते हैं क्या इसी दिन को देखने के लिए ? समाज के हित की बात करने वाले लोग सोशल मीडिया के माध्यम से स्वयं को बड़े से बड़ा समाजसेवी बताने वाले लोग ऐसे गम्भीर मसलों पर क्यों चुप रहते हैं या समाजसेवा करने के नाम पर सिर्फ सोशल मीडिया पर ही स्वयं को हाईलाईट करना उद्देश्य है? सवाल बहुत छोटा है मगर मुद्दा उतना ही बड़ा कि इस दहेजरूपी दानव का खात्मा कब और कैसे होगा ?
यदि आप वास्तव में समाज के हित में कार्य करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम ग्राम पंचायत स्तर से शुरुआत क्यों नही करते कि न दहेज लेंगे न ही दहेज देंगे और यदि कोई भी परिवार इसका उलंघन करने की कोशिश करे तो सामाजिक बहिष्कार कर दीजिए व ग्राम पंचायत से शुरू करते हुए इस मुहिम को जनपद स्तर तक ले जाइए जिसमें प्रबुद्ध वर्ग से लेकर आम जनमानस , जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी भी इसका हिस्सा बने ताकि कोई बहन बेटी दोबारा दहेजरूपी दानव का शिकार न हो।जनपद सिद्धार्थनगर में मंगलवार की सांय मिश्रौलिया थाना क्षेत्र के खैराखास निवासी कुलदीप पुत्र सीताराम ने अपनी माँ चिनका पत्नी सीताराम व बड़े भाई रवेंद्र पुत्र सीताराम की पत्नी दीपा व ननद नेमा पुत्री सीताराम के साथ मिलकर पांच वर्ष पूर्व विवाह कर लाई पत्नी रंजू को दर्दनाक रूप से मारकर लाश को जला दिया जिसपर दहेज हत्या के लिए उक्त सभी के खिलाफ 304 बी के तहत नामजद मुकदमा दर्ज कर दोषियों को सजा दिलाने की कार्यवाई मिश्रौलिया पुलिस ने प्रारंभ तो कर दी परन्तु इन सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि मृतका की ढाई वर्षीय पुत्री प्रियांशी के सिर से माँ के आंचल छीनने वाले ऐसे लोगों के लिए किस तरह की सजा को प्रभाव में लाएं ? रंजू तो सिर्फ एक उदाहरण मात्र है वरना रंजू जैसी हजारों बहन-बेटियां दहेज रूपी नाग का शिकार हो रहीं।वर्तमान में दहेज के चलते लोग पुत्री के जन्म पर ईश्वर को कोसते हैं बिना यह सोचे कि वह स्वयं किसी औरत की कोख से ही जन्में हैं लेकिन स्थिति अत्यधिक कष्टदायक तब होती है जब स्वयं एक औरत चाहे वो सास के रूप में हो या जेठानी-देवरानी या ननद के रूप में हो इस जघन्य अपराध का सबसे अहम हिस्सा बनती है बिना यह सोचे कि उनकी भी बेटी  को यदि कोई इसी तरह जलाए तो कैसा लगेगा लेकिन चन्द रूपयों की खातिर वह औरत भी सब भूल जाती है।रंजू जैसी बहन-बेटियां कब तक इस दहेजरूपी नाग का शिकार होती रहेंगी यह एक ज्वलंत मुद्दा है जिसका जवाब शायद किसी के पास नही।

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