जनपद सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा के कलम से निकलने वाले लेख व गजल आजकल देश के हर कोने में लोगों द्वारा सराहे जा रहे। मेराज़ मुस्तफा एक ऐसा नाम जो जेहन में आते ही उस युवा ग्राम प्रधान की छवि को दर्शाता है जो कभी समाचार पत्रों में ग्रामीण विकास से लेकर समाज की बात रखकर छाया रहता था वही मेराज़ मुस्तफा आज अपनी कलम की बदौलत नए रूप में जाना पहचाना जाने लगा है। अब तक विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख व गजलों के द्वारा देश के विभिन्न कोनों के वरिष्ठ साहित्यकार से लेकर पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्तियों द्वारा सोशल मीडिया व्हाट्सएप एवं फोन कॉल से शुभकामना सन्देश देने के साथ उज्ववल भविष्य की कामना एवं आशीर्वाद देने के हजारों मैसेज मिल जाएंगे जो कि बहुत ही कम समय में इतने बड़े साहित्यकारों व पत्रकारिता जगत से जुड़ी हस्तियों द्वारा सराहना मिलना किसी बड़े पुरुस्कार से कम नही । युवा ग्राम प्रधान से युवा रचनाकार के रूप में पहचान मिलना मेराज़ मुस्तफा के लिए किसी वरदान से कम साबित नही हो रहा और सबसे बड़ी बात यह है कि आज तक किसी भी कवि सम्मेलन व मुशायरे के मंचों पर न दिखाई देने वाला यह युवा रचनाकार आज सारे देश में अपनी रचनाओं से इन मंचों पर बैठकर काव्यपाठ करने व अपनी गजल सुनाने वाले बड़े दिग्गजों के आशीर्वाद व दुआओं का भागीदार बन चुका है जो किसी अचम्भे से कम नही है । मेराज़ मुस्तफा से हमारे ब्यूरो चीफ ने इस विषय में बात की तो युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा ने कहा कि कवि सम्मेलनों व मुशायरों में हिस्सा न लेना ही अब तक मेरे लिए वरदान साबित हुआ है क्योंकि जिन रचनाओं की बदौलत इन मंचों को सुसज्जित करने वाली बड़ी हस्तियों के आशीर्वाद व दुआएं आज मिल रही इसी वजह से मिल रही क्योंकि बिना किसी साहित्यिक मंच के ही अपनी उपस्थिति इन बड़ी हस्तियों के ह्रदय में कर जाना बड़ी बात है । मेराज़ मुस्तफा से यह पूछने पर कि क्या आगे साहित्यिक मंचों पर दिखाई देंगे या नही जिसपर युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा ने कहा कि अब तक लगभग तीन सौ रचनाओं को संग्रहित कर चुका हूं ऐसे में यदि कोई भी व्यक्ति ऐसे आयोजनों आमंत्रित करेगा तो निश्चित ही जाएंगे क्योंकि पहले इन मंचों पर न जाने का कारण यह भी था कि दिल में अंदेशा रहता था पता नही जो लिखा है वह सही ढंग से लिख सके हैं या नही और अब जबकि हिंदी - उर्दू अदब के बड़ी हस्तियों के दुआओं व आशीर्वाद मिल रहा तो एक अलग हिम्मत मिल चुकी है कि यदि लिखने में गलती होती तो देशभर से शुभकामना संदेश नही प्राप्त होते। बेहद कम समय में एक रचनाकार के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले युवा ग्राम प्रधान व सीनियर जर्नलिस्ट मेराज़ मुस्तफा को भविष्य में भी इसी तरह सफलता मिलती रहे यही कामना है। पेश हैं
युवा ग्राम प्रधान वरिष्ठ पत्रकार व युवा रचनाकार की कुछ पंक्तियां -
बुलंदी जरा सी उनको अता क्या हुई दूसरों को हक़ीर समझ बैठे हैं,
माजी में झांककर देख लो शहंशाह जमीं और तख्त पर फकीर बैठे हैं।
ऐसा नही है कि हर इक शय ही बेचैन है सकून पाने को,
दरबारों में फकीरों की दुआ के लिए वक्त के वजीर बैठे हैं।
बात कहना और फिर यूं हरशूं देखना यह तो आदत न थी,
आज जालिम हुक्मरान नीलाम कर अपना जमीर बैठे हैं।
बात हकीकी हो या फिर बात हो अफ़सानों की 'मेराज़' बोल दो बेझिझक,
अदब की महफ़िल है यहां गालिब,इकबाल,दुष्यंत मीर तकी मीर बैठे हैं।

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