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Monday, July 16, 2018

होटल व दुकानों पर सिसकते हुए बचपन का जिम्मेदार कौन?

पवन यादव की रिपोर्ट 
बढ़नी सिद्धार्थनगर
सीमावर्ती कस्बा बढ़नी व ग्रामीण इलाकों में कई दुकान व होटलों पर छोटे-छोटे बच्चे काम करते देखे जा रहे हैं ऐसे में इन बच्चों का भविष्य कैसे उज्जवल होगा। यह एक बड़ा सवाल है।
प्रवेश प्रारम्भ...प्रवेश प्रारम्भ...प्रवेश प्रारम्भ 
चौधरी विद्या देवी इण्टर कालेज मोहाना चौक , नेउरा कोठी           रोड , शिवपतिनगर , सिद्धार्थनगर 
                              प्रधानाचार्य
                              नूर मोहम्मद 
                        मोबाईल 9918194006
एक तरफ प्रदेश की योगी सरकार बच्चो के बेहतर भविष्य के लिए हर जतन कर रही है कि देश के प्रत्येक छोटे-छोटे बच्चे पढ़ लिख कर शिक्षित बने मगर अफसोस है कि सरकार की सभी योजनाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है, एक तरफ सरकार का नारा है कि सब पढ़े सब बढ़े मगर ये सभी नारे शहर से गांव तक आते-आते औंधे मुंह गिरे दिखाई पड़ते है।इन मासूम बच्चों को छोटी सी उम्र में मजदूरी करता देख ऐसा लगता है कि यह सभी योजनाये सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह गयी है।
 ‘बाल श्रमिकों का है अधिकार, रोटी-खेल-पढ़ाई प्यार, शिक्षा का प्रबंध करो, बाल मजदूरी बंद करो’ ये नारे श्रम विभाग के फाइलों में ही दम तोड़ रही है । शहर के चाय-नाश्ते की दुकान से लेकर होटल व फुटपाथ के लिट्टी-मीट दुकान पर भी बच्चे देर रात तक काम करते हैं. श्रम विभाग के अधिकारी इन बच्चों को न्याय दिलाने के बजाय खुद बिना पैसे के लिट्टी-मीट खाने में लगे रहते हैं. खाने-खेलने की उम्र में काम करना या काम कराना दोनों अपराध है. चाहे वह बड़े दुकान की बात हो या होटलों व फुटपाथी दुकानों की. बढ़नी कस्बे  के सभी दुकानों व होटलों में बाल मजदूर खुले रूप से काम करते हैं. करें भी क्यों नहीं, आखिर पापी पेट का सवाल है. कोई अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए बाल मजदूरी कर रहा है तो कोई अपने बूढ़े मा-बाप की दवाई के लिए. निश्चित रूप से बच्चों से बचपन छीनता जा रहा लेकिन इसके लिए जिस विभाग को सरकार ने जिम्मेदार बनाया है वह खुद बच्चों के  बचपन को बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता.  कौन है बाल मजदूर. बाल मजदूर का मतलब 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चे. जो छोटे-छोटे फुटपाथी दुकानों एवं होटलों में काम करते हैं. जिन्हें अपने भविष्य के बारे में पता ही नहीं कि क्या होगा. कॉपी-किताब की जगह हाथ में झाड़ू-पोछा के कपड़े व जूठा प्लेट में अपनी जिंदगी सवार रहे हैं.   गरीब तबके के हैं बाल मजदूर. बाल श्रम करने वाले जितने भी मजदूर हैं  सभी गरीब तबके के हैं. जिसके मां-बाप काम करने में असमर्थ हैं या खुद गलत आदतों से ग्रसित है. कुछ ऐसे भी बच्चे हैं जो अनाथ हैं और उसकी परवरिश उसी होटल मालिकों एवं दुकान के मालिकों द्वारा किया जाता है. ऐसे में बच्चे काम नहीं करेंगे तो उनकी जिंदगी का गुजारा मुश्किल हो जायेगा. चाय-नाश्ते की दुकान में सिमटी है जिंदगी. हंसने-खेलने के उम्र में बच्चे अपने भविष्य में बारे में जानते भी नहीं कि आने वाले समय में क्या होगा. वे तो सिर्फ इतना जानते हैं कि काम करेंगे तो कुछ पैसा और खाना मिलेगा. यही कारण है कि  बढ़नी ,ढेबरुआ ,ढेकहरी ,तुलसीयापुर ,सिसवा चौराहा , छोटे-छोटे बालक होटल, गैराज, साइकिल दुकान व फुटपाथ पर लगने वाले नाश्ते की दुकानों पर काम करते देखे जा सकते हैं. नियमों की उड़ रही धज्जियां. कस्बे के विभिन्न प्रतिष्ठानों में 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चों से काम लिया जा रहा है. चाहे वह साइकिल की दुकान हो या होटल की. कम पैसे देकर इस तरह के बच्चों से काम लिया जा रहा है. जिसे दो वक्त की रोटी के साथ 500-1000 रुपये थमा दिया जाता है ।

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