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Monday, September 9, 2019

आज शहीद वीर अब्दुल हमीद जी की शहादत की कहानी उनके शहीद दिवस पर -भारत मां के वीर सपूत थे शहीद वीर अब्दुल हमीद ।

अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई, 1933 को उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले में स्थित धरमपुर नाम के छोटे से  गांव में एक गरीब मुस्लिम परिवार में  हुआ था. और उनके पिता का नाम मोहम्मद उस्मान था. उनके यहाँ परिवार की आजीविका को चलाने के लिए कपड़ों की सिलाई का काम होता था. 
लेकिन अब्दुल हमीद का दिल इस सिलाई के काम में बिलकुल नहीं लगता था, उनका मन तो बस कुश्ती दंगल और दांव पेंचों में लगता था. क्युकी पहलवानी उनके खून में थी जो विरासत के रूप में मिली उनके पिता और नाना दोनों ही पहलवान थे. वीर हमीद शुरू से ही लाठी चलाना कुश्ती करना और बाढ़ में  नदी को तैर कर पार करना, और सोते समय फौज और जंग के सपने देखना तथा अपनी गुलेल से पक्का निशाना लगाना उनकी खूबियों में था. और वो इन सभी चीजों में सबसे आगे रहते थेउनका एक गुण सबसे अच्छा था जोकि दूसरो की हर समय मदद करना. जरूरतमंद लोगो की सहायता करना. और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना और उसे बर्दास्त ना करना. एसी ही घटना एक बार उनके गाँव में हुयी जब एक गरीब किसान की फसल को जबरजस्ती वहा के ज़मींदार के लगभग 50 गुंडे काट कर ले जाने के लिए आये तब हमीद को यह बात का पता चला और उन्हें यह बात बर्दास्त नहीं हुयी और उन 50 गुंडों से अकेले ही भीड़ गए. जिसके कारण उन सभी गुंडों को भागना पड़ा. और उस गरीब किसान की फसल बच गयी.

एक बार तो अपने प्राणों की बाजी लगा कर गाँव में आई भीषण बाढ़ में डूबती दो युवतियों की जान बचायी. और अपने साहस का परिचय दियाधीरे धीरे उनकी उम्र बढती गयी और वो 21 साल के हो गए. और अपने जीवन यापन के लिए रेलवे में भर्ती होने गए. लेकिन उनका मन तो बस देश प्रेम के प्रति लगा था, और सेना में भर्ती हो के देश की सेवा सच्चे मन से करना था. आखिरकार हमीद का सपना पूरा हुआ और सन 1954 में सेना के अन्दर भर्ती  हो गये और  अपना कार्यभार संभालाचीनी फौज से मुकाबला 
1962 में चीन का हमला भारत पर हुआ तब वीर हमीद को मौका  मिला अपने  देश के लिए कुछ कर दिखाने का उस युद्ध में हमारी सेना का एक जत्था चीनी सैनिको के घेरे में आ गया जिसमे हमीद भी थे. और उनकी यह परीक्षा की घड़ी थी. वह लगातार मौत को चकमा दे मुकाबले के लिए डटे रहे मोर्चे पर लेकिन उनका  शरीर लगातार खून से भीगता जा रहा था और उनके साथी एक एक कर के कम होते जा रहे थे. लेकिन इसके विपरीत वीर हमीद की मशीनगन मौत के गोले उगल रही थी, दुशमनों पर. और एक समय आया धीरे धीरे कर के उनके पास उपलब्ध गोले और गोलिया ख़त्म हो गए. अब हमीद करे तो क्या करे जैसी स्थिति में आ गए. और खाली हो चुकी मशीन गन का क्या करे दुशमनो के हाथ ना लगे इस लिए अपनी मशीनगन को तोड़ डाला और अपनी वीरता के साथ समझदारी दिखाते हुए बर्फ से घिरी पहाड़ियों से रेंगते हुए वहा  से निकल पड़ेपाकिस्तान ने 8 सितम्बर 1965 की रात  में भारत पर हमला बोल दिया और दोनों देश के बीच जंग शुरू हो गयी तब एक बार फिर वीर हमीद को अपनी जन्म भूमि के लिए कुछ करने का मौका मिल गया.वीर हमीद पंजाब के तरन तारन जिले के खेमकरण सेक्टर पंहुचे जहा युद्ध हो रहा था. पकिस्तान के पास उस समय सबसे घातक  हथियार के रूप में था "अमेरिकन पैटन टैंक"  थे जिसे लोहे का शैतान भी कहा जा सकता हैं और इस पैटन टैंकों पर पकिस्तान को बहुत नाज था. और पाक ने उन्ही टैंको के साथ "असल उताड़" गाँव पर ताबड़तोड़ हमला कर दियाउधर पकिस्तान के पास अमेरिकन पैटन टैंकों का ज़खीरा इधर भारतीय सैनिको के उन तोपों से मुकाबला करने के लिए कोई बड़े हथियार ना थे.  था तो बस भारत माता की दुशमनो से रक्षा करते हुए रणभूमि में शहीद हो जाने का हौसला था और हथियार के नाम पर  साधारण "थ्री नॉट थ्री रायफल" और एल.एम्.जी थे. और इन्ही हथियारों के साथ दुशमनो के छक्के छुड़ाने लगे हमारे सभी वीर सैनिक. 

इधर वीर अब्दुल हमीद के पास अमेरिकन पैटन टैंकों के सामने खिलौने सी लगने वाली "गन माउनटेड जीप" थी. पर दुशमनो को यह नहीं पता था उस पर सवार वीर नहीं परमवीर अब्दुल हमीद हैं.जिनका निशाना महाभारत के अर्जुन की तरह हैं. 

जीप पर सवार दुशमनो से मुकाबला करते हुए हमीद पैटन टैंकों के उन कमजोर हिस्सों पर अपनी गन से इतना सटीक निशाना लगाते थे जिससे लोह रूपी दैत्य धवस्त हो जाता. और इसी तरह अपनी गन से एक एक कर टैंको को नष्ट करना शुरू कर दिया. उनका यह पराक्रम देख दुश्मन भी चकित से रह गए. जिन टैंको पर पकिस्तान को बहुत नाज था. इस युद्ध में वो शहीद हो गए और उनकी मृत्यु 9 सितम्बर को हो चुकी थी परंतु आधिकारिक तौर पर इसकी घोषणा 10 सितम्बर को की गयी । जिसे वीर अब्दुल हमीद के शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है । 

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