शैलेष कुमार सोनकर (न्यूज़ एडीटर )/सत्येन्द्र उपाध्याय क़ी एक रिपोर्ट -
सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा ने बहुत ही कम समय में साहित्यिक व पत्रकारिता जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। इटवा तहसील क्षेत्र के रेहरा उर्फ भैसाही निवासी मेराज़ मुस्तफा ने बेहद ही कम समय में साहित्यिक व पत्रकारिता जगत में एक ऐसा मुकाम हासिल किया जो कुछ लोग वर्षों की मेहनत के बाद भी नही कर पाते।रेहरा उर्फ भैसाही निवासी मेराज़ मुस्तफा जर्नलिस्ट व लेखक व शायर होने के साथ ही अपने ग्रामसभा के ग्राम प्रधान भी हैं जो कि जनपद के सबसे कम उम्र के ग्राम प्रधानों में से एक हैं। महज तेईस वर्ष की आयु में ग्राम प्रधान चुने जाने वाले मेराज़ मुस्तफा उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायती राज संगठन में प्रवक्ता होने के अतिरिक्त एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र व कई महत्वपूर्ण न्यूज वेब पोर्टल में बतौर सीनियर जर्नलिस्ट भी कार्य कर रहे। आज आपके समक्ष पेश हैं मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह "अधूरे ख्वाब भरे किरदार" की कुछ रचनाएं-
वही लोग जो कल तक पढ़ते थे कसीदे तेरी शान में,
क्यूं आज उनकी नजरों में तू बेहद खराब लगता है।
कर दिया इजाफा दौलत-ओ-शोहरत में बेहिसाब पल भर में उसने,
उसकी नवाजिशों का अदा कर शुक्र सबको बुरा मेरा यह जवाब लगता है।
चल यहां से कहीं दूर चलें कि रास्ता ही भटक जाएं उम्र भर के लिए,
मुस्कुरा कर मेरी बात पर कहा उसने तू तो इश्क़ में बर्बाद लगता है।
छोटी हों या बड़ी हसरतें कभी भी किसी की गैर मुनासिब पूरी न करना,
खुदा मेरे यह दुनिया है यहां गरीब को अमीर अमीर को गरीब अजाब लगता है।
उम्मीद वो भी इस मक्कार दुनियां से करते हो तुम भलाई की,
लोग तो ऐसे हैं यहां 'मेराज़' कि तुम पानी भी पियो तो सबको शराब लगता है।
इस पंक्तियों के अतिरिक्त वर्तमान हालात पर मेराज़ मुस्तफा की यह पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं -
सुना है फिर से कोई नया फरमान आने वाला है,
मेरे खुदा क्या फिर यहां कोई तूफान आने वाला है।
बांटकर धर्म मजहब में चमका ली लोगों ने अपनी सियासी दुकान,
कह दिया श्री राम ने भी अब नही कोई हनुमान आने वाला है।
मन्दिर - ओ - मस्जिद करते - करते सदियां बीत जाएंगी,
मगर अब पैगम्बर - ए - खुदा न ही श्रीराम जैसा भगवान आने वाला है।
इश्क़ है वतन की मिट्टी से तो कुछ यूं कर जा 'मेराज़' कि,
लोग हिन्दू - मुस्लिम भूलकर कहें यही मेरे हिन्दुस्तान वाला है।
मेराज़ मुस्तफा की यह रचना देश व समाज को सियासी रूप से बांटने वालों पर कड़ा प्रहार करती है।युवा रचनाकार की कलम से निकले हर एक रचनाओं में कोई न कोई संदेह छिपा होता है। मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह में दो सौ चालीस रचनाओं का बेहतरीन संगम है एवं हर एक रचना दिल को झकझोर देती हैं। युवाओं के पसंदीदा विषय मोहब्बत पर आधारित रचनाएं मोहब्बत व ईश्वर की इबादत के बीच के फर्क को दर्शाती हैं तो मेराज़ मुस्तफा की किसी रचना में मोहब्बत और प्यार पर भी उंगली भी उठाती हैं कि किस तरह प्यार व मोहब्बत के नाम पर लोगों के जज्बातों से खेल खेला जाता है।
करते हो मोहब्बत तो उसको यूं कभी मशहूर न करना,
करके इकरार सरेआम मोहब्बत को कभी रन्जूर न करना।
दीदार - ए- यार के लिए तड़प रहीं यह आँखें कबसे,
कि दुश्मन-ए- जां अब आ भी जा जख्मों को मेरे नासूर न करना।
ज्यादा नवाजिशे भी नही ठीक हर शय के लिए इतना,
दुआ है अल्लाह मेरे अपनों को कभी मगरूर न करना।
उस बेवफा को पाने की चाह में तुझको भी भूल जाऊँ,
इक बेवफा के लिए देकर मोहब्बत मुझे खुद से कभी दूर न करना।
मोहताज कभी दूसरों का बनाकर न रखना 'मेराज़' को अपने सिवा,
मौला मेरे नेअमतें अता कर या न कर मगर अना को मेरी कभी माजूर न करना।
ऐसी ही रचनाओं से सुसज्जित मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह की अन्य कुछ रचनाओं को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि हम किसी युवा एवं बेहद कम समय में साहित्यिक जगत में कदम रखने वाले रचनाकार की नही बल्कि किसी उच्च कोटि के रचनाकार के समक्ष बैठकर उनकी रचनाओं को पढ़ रहे। मेराज़ मुस्तफा की रचनाओं को पढ़कर होने वाले एहसास को लफ्जों में बयान करना भी मुश्किल हैयुवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा को उनके अतिशीघ्र प्रकाशित होने वाले काव्य संग्रह की अग्रिम बधाई एवं शुभकामनाएं। ईश्वर इस युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा पर अपनी कृपा बनाए रखें यही कामना है।
सिद्धार्थनगर के युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा ने बहुत ही कम समय में साहित्यिक व पत्रकारिता जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। इटवा तहसील क्षेत्र के रेहरा उर्फ भैसाही निवासी मेराज़ मुस्तफा ने बेहद ही कम समय में साहित्यिक व पत्रकारिता जगत में एक ऐसा मुकाम हासिल किया जो कुछ लोग वर्षों की मेहनत के बाद भी नही कर पाते।रेहरा उर्फ भैसाही निवासी मेराज़ मुस्तफा जर्नलिस्ट व लेखक व शायर होने के साथ ही अपने ग्रामसभा के ग्राम प्रधान भी हैं जो कि जनपद के सबसे कम उम्र के ग्राम प्रधानों में से एक हैं। महज तेईस वर्ष की आयु में ग्राम प्रधान चुने जाने वाले मेराज़ मुस्तफा उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायती राज संगठन में प्रवक्ता होने के अतिरिक्त एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र व कई महत्वपूर्ण न्यूज वेब पोर्टल में बतौर सीनियर जर्नलिस्ट भी कार्य कर रहे। आज आपके समक्ष पेश हैं मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह "अधूरे ख्वाब भरे किरदार" की कुछ रचनाएं-
वही लोग जो कल तक पढ़ते थे कसीदे तेरी शान में,
क्यूं आज उनकी नजरों में तू बेहद खराब लगता है।
कर दिया इजाफा दौलत-ओ-शोहरत में बेहिसाब पल भर में उसने,
उसकी नवाजिशों का अदा कर शुक्र सबको बुरा मेरा यह जवाब लगता है।
चल यहां से कहीं दूर चलें कि रास्ता ही भटक जाएं उम्र भर के लिए,
मुस्कुरा कर मेरी बात पर कहा उसने तू तो इश्क़ में बर्बाद लगता है।
छोटी हों या बड़ी हसरतें कभी भी किसी की गैर मुनासिब पूरी न करना,
खुदा मेरे यह दुनिया है यहां गरीब को अमीर अमीर को गरीब अजाब लगता है।
उम्मीद वो भी इस मक्कार दुनियां से करते हो तुम भलाई की,
लोग तो ऐसे हैं यहां 'मेराज़' कि तुम पानी भी पियो तो सबको शराब लगता है।
इस पंक्तियों के अतिरिक्त वर्तमान हालात पर मेराज़ मुस्तफा की यह पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं -
सुना है फिर से कोई नया फरमान आने वाला है,
मेरे खुदा क्या फिर यहां कोई तूफान आने वाला है।
बांटकर धर्म मजहब में चमका ली लोगों ने अपनी सियासी दुकान,
कह दिया श्री राम ने भी अब नही कोई हनुमान आने वाला है।
मन्दिर - ओ - मस्जिद करते - करते सदियां बीत जाएंगी,
मगर अब पैगम्बर - ए - खुदा न ही श्रीराम जैसा भगवान आने वाला है।
इश्क़ है वतन की मिट्टी से तो कुछ यूं कर जा 'मेराज़' कि,
लोग हिन्दू - मुस्लिम भूलकर कहें यही मेरे हिन्दुस्तान वाला है।
मेराज़ मुस्तफा की यह रचना देश व समाज को सियासी रूप से बांटने वालों पर कड़ा प्रहार करती है।युवा रचनाकार की कलम से निकले हर एक रचनाओं में कोई न कोई संदेह छिपा होता है। मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह में दो सौ चालीस रचनाओं का बेहतरीन संगम है एवं हर एक रचना दिल को झकझोर देती हैं। युवाओं के पसंदीदा विषय मोहब्बत पर आधारित रचनाएं मोहब्बत व ईश्वर की इबादत के बीच के फर्क को दर्शाती हैं तो मेराज़ मुस्तफा की किसी रचना में मोहब्बत और प्यार पर भी उंगली भी उठाती हैं कि किस तरह प्यार व मोहब्बत के नाम पर लोगों के जज्बातों से खेल खेला जाता है।
करते हो मोहब्बत तो उसको यूं कभी मशहूर न करना,
करके इकरार सरेआम मोहब्बत को कभी रन्जूर न करना।
दीदार - ए- यार के लिए तड़प रहीं यह आँखें कबसे,
कि दुश्मन-ए- जां अब आ भी जा जख्मों को मेरे नासूर न करना।
ज्यादा नवाजिशे भी नही ठीक हर शय के लिए इतना,
दुआ है अल्लाह मेरे अपनों को कभी मगरूर न करना।
उस बेवफा को पाने की चाह में तुझको भी भूल जाऊँ,
इक बेवफा के लिए देकर मोहब्बत मुझे खुद से कभी दूर न करना।
मोहताज कभी दूसरों का बनाकर न रखना 'मेराज़' को अपने सिवा,
मौला मेरे नेअमतें अता कर या न कर मगर अना को मेरी कभी माजूर न करना।
ऐसी ही रचनाओं से सुसज्जित मेराज़ मुस्तफा के काव्य संग्रह की अन्य कुछ रचनाओं को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि हम किसी युवा एवं बेहद कम समय में साहित्यिक जगत में कदम रखने वाले रचनाकार की नही बल्कि किसी उच्च कोटि के रचनाकार के समक्ष बैठकर उनकी रचनाओं को पढ़ रहे। मेराज़ मुस्तफा की रचनाओं को पढ़कर होने वाले एहसास को लफ्जों में बयान करना भी मुश्किल हैयुवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा को उनके अतिशीघ्र प्रकाशित होने वाले काव्य संग्रह की अग्रिम बधाई एवं शुभकामनाएं। ईश्वर इस युवा रचनाकार मेराज़ मुस्तफा पर अपनी कृपा बनाए रखें यही कामना है।


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